देश विदेश राज्य राजनीति अपराध स्पोर्ट्स बिजनेस मनोरंजन टेक ऑटोमोबाइल

---Advertisement---

उदाकिशुनगंज के गड्ढेनुमा खेत भी उगल रहे सोना,अब उदाकिशुनगंज के खेतों में भी हो रही है मखाने की खेती

On: July 13, 2025 8:30 AM
Follow Us:
---Advertisement---

उदाकिशुनगंज के गड्ढेनुमा खेत भी उगल रहे सोना,अब उदाकिशुनगंज के खेतों में भी हो रही है मखाने की खेती

:-मखाने की खेती कर तराई इलाकों के किसान बढ़ा रहे हैं अपनी आमदनी

 

न्यूज़96इंडिया, मधेपुरा,कौनैन बशीर

मधेपुरा जिले के उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र में मखाना की खेती से किसान समृद्ध हो रहे हैं. अनुमंडल में मखाना की खेती के प्रति किसानों का रुझान लगातार बढ़ रहा है. खासतौर पर जिन गड्ढेनुमा खेतों का उपयोग अन्य फसलों के लिए नहीं हो पा रहा था, उस जमीन में मखाना लगाकर किसान बेहतर कमाई कर रहे हैं. उदाकिशुनगंज के शहजादपुर, खाड़ा, बुधमा, सिंगारपुर आदि की मिट्टी और जलवायु मखाना की खेती के लिए अनुकूल है.

विज्ञापन-प्रगति कोचिंग सेंटर,उदाकिशुनगंज

ऐसे तो यहां करीब दस वर्षो से मखाना की खेती हो रही है, लेकिन हाल के तीन-चार वर्षों से मखाना की ज्यादा खेती हो रही है. अभी करीब पांच सौ हेक्टेयर में मखाना की खेती हो रही है. मखाना किसान मिठ्ठू मंडल, नूरो मंडल, मुसन मंडल,रिजवान आलम आदि ने बताया कि इसमें मेहनत तो ज्यादा है, लेकिन मुनाफा भी बेहतर है. इसलिए मखाने की खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है. जिन किसानों की ज़मीन बंजर होने और जलभराव की वजह से बेकार पड़ी थी और किसान उस खेतों में दाने-दाने को मोहताज हो गए थे. अब वही किसान अपनी बेकार पड़ी ज़मीन में मखाने की खेती कर खुशहाल ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं.

विज्ञापन-माँ बन्नी ऑटोमोबाईल,उदाकिशुनगंज

बहुत से किसान ने खुद ही खेत पट्टे पर लेकर मखाने की खेती शुरू कर दी है. उन्हें मखाने की बिक्री के लिए बाज़ार भी जाना नहीं पड़ता. कारोबारी खुद उनके पास से उपज ले जा रहे हैं. ये सब किसानों की लगन और कड़ी मेहनत से ही मुमकिन हो पा रहा है.

उदाकिशुनगंज में 500 किसान कर रहे मखाना की खेती :-

जानकार बताते हैं कि शुरुआती दौर में उदाकिशुनगंज में कुछ किसानों ने प्रयोग के तौर पर गड्ढेनुमा खेतों में मखाना की खेती की. इक्के-दुक्के किसानों ने ही दूसरी जगहों से मखाना लाकर इसकी बुआई की थी. कम लागत में अच्छी-खासी आमदनी होने से किसानों का रुझान मखाना खेती की ओर बढ़ता चला गया. अब उदाकिशुनगंज अनुमंडल क्षेत्र में करीब 500 हेक्टेयर भूमि में मखाना की खेती हो रही है. इनमें अधिकांश गड्ढेनुमा बेकार पड़े खेत शामिल हैं. किसानों ने बताया कि आने वाले समय में मखाना खेती का रकवा और बढ़ सकता है. इसका कारण मखाना की खेती के प्रति लोगों का लगातार बढ़ता रुझान है.

मिथिलांचल में पैदा होने वाला मखाना अब उदाकिशुनगंज :-

बिहार के मिथिलांचल में पैदा होने वाला मखाना अब उदाकिशुनगंज प्रखंड क्षेत्र के सहजादपुर, नयानगर, खाड़ा, बुधमा, लश्करी सहित अन्य पंचायत के खेतों में भी दस्तक दे दिया है. बढ़ती आबादी और घटती तालाबों और तालों की संख्या के बाद मखाना अनुसंधान संस्थान दरभंगा के कृषि वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें अब खेतों में भी मखाना की खेती हो रही है.

विज्ञापन-दास एडवरटाइजिंग ऐजेंसी उदाकिशुनगंज

मालूम हो की सहजादपुर पंचायत के चौरी भित्ता के कई ऐसे क्षेत्र हैं,जहां पर खेतों में साल भर जल जमाव रहता है. ऐसे में इन खेतों में मखाना की खेती करके दर्जनों किसान आर्थिक रूप से समृद्ध हो हो रहे हैं. राजेंद्र सिंह,विनोद मंडल आदि किसानों ने बताया कि मखाना के खेती के लिए खेत में पानी जमा होना चाहिए. सरकार की तरफ से भी मखाना की खेती को भी बढ़ावा देने के लिए काम किए जा रहे हैं.

विज्ञापन-आर्मी फिजिकल अकैडमी,उदाकिशुनगंज

मखाना देश के साथ ही अंतरराष्टीय बाजार में बहुत ज्यादा मांग है. बताया जाता है कि भारत के अलावा चीन, जापान, कोरिया और रूस में मखाना की खेती की जाती है. देश में बिहार के दरभंगा और मधुबनी में सबसे ज्यादा मखाना की खेती की जाती है. वही उदाकिशुनगंज अनुमंडल में बड़ी संख्या में जो तालाब हैं और जिसमें मछली पालन होता है वहां भी मखाना की खेती की बहुत संभावना है. मखाना की खेती की एक विशेषता यह भी है कि इसमें लागत बहुत कम आती है. इसकी खेती के लिए तालाब या ताल चाहिए जहाँ जल जमाव वाले खेत हो.

मखाने उगाने और बनाने की विधि :-

मखाने के फूल कमल की तरह होते हैं जो उथले पानी वाले तालाबों में पाए जाते हैं. इसीलिए जलभराव वाले क्षेत्रों यहां धान के खेतों में भी इसे उगाया जा सकता है. इसकी खेती के लिए तापमान 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तथा सापेक्षिक आर्द्रता 50 से 90 प्रतिशत होनी चाहिए. मखाने की खेती के लिए तालाब चाहिए होता है जिसमें ढाई से तीन फीट पानी होना चाहिए.

विज्ञापन-दास एडवरटाइजिंग एजेंसी,उदाकिशुनगंज

इसकी खेती में किसी भी प्रकार की खाद का इस्तेमाल नहीं किया जाता. खेती के लिए, बीजों को पानी की निचली सतह पर 1 से डेढ़ मीटर की दूरी पर डाला जाता है. बुवाई के महीने दिसंबर से जनवरी के बीच के होते है. बुवाई के बाद पौधों का पानी में ही लगाया जाता है. इसकी पत्ती के डंठल एवं फलों तक पर छोटे-छोटे कांटे होते हैं. इसके पत्ते बड़े और प्लेटों की तरह गोल-गोल पानी पर तैरते रहते हैं. अप्रैल के महीने में पौधों में फूल लगना शुरू हो जाता है.

फूल बाहर नीला और अन्दर से जामुनी या लाल और कमल जैसा दिखता है. फूल पौधों पर कुछ दिन तक रहते हैं. और फूल के बाद कांटेदार-स्पंजी फल लगते हैं, जिनमें बीज होते हैं. यह फल और बीज दोनों ही खाने योग्य होते हैं. फल गोल-अण्डाकार, नारंगी के तरह होते हैं और इनमें 8 से 20 तक की संख्या में कमलगट्टे से मिलते जुलते काले रंग के बीज लगते हैं. फलों का आकार मटर के दाने के बराबर तथा इनका बाहरी आवरण कठोर होता है. जून-जुलाई के महीने में फल कटना शुरू कर देते है.

पोषक तत्वों की बदौलत बढ़ा दायरा :-

मखाना में अधिक मात्रा में पोषक तत्व पाए जाने के कारण मांग बढ़ने लगी तो खेती भी बड़े पैमाने पर होने लगी है. इसमें प्रति 100 ग्राम मखाने में 9.7 फीसद प्रोटीन, 75 फीसद कार्बोहाइड्रेट, आयरन और वसा के अलावा 382 किलो कैलोरी मिलती है. इसमें दूध और अंडे के मुकाबले ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है.

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Leave a Comment