
मुरलीगंज। सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना प्रखंड क्षेत्र में अपने मूल उद्देश्य से भटकती नजर आ रही है। शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के बड़े वादों के बीच जमीनी स्तर पर हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में यह योजना लोगों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि सरकारी दावों और वास्तविकता के बीच गहरी खाई का प्रतीक बन गई है। स्थानीय लोगों, पंप ऑपरेटरों और जनप्रतिनिधियों की मानें तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अधिकांश जगहों पर योजना अधूरी, बदहाल और उपेक्षित स्थिति में है। ग्रामीणों का आरोप है कि योजना कागजों और सरकारी रिपोर्टों में भले सफल दिखाई जा रही हो, लेकिन धरातल पर इसकी तस्वीर बेहद चिंताजनक है।
कई वार्डों में पाइपलाइन अधूरी है, कहीं जलापूर्ति बाधित है, तो कहीं पानी की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि ठेकेदारों से लेकर संबंधित विभागीय अधिकारियों तक की उदासीनता का खामियाजा आम जनता भुगत रही है, जबकि सरकार की छवि और खजाने दोनों को नुकसान हो रहा है। स्थानीय नागरिकों ने तीखा आरोप लगाते हुए कहा कि यदि जिले के वरीय अधिकारी, विभागीय सचिव या मुख्य सचिव स्वयं गांवों में पहुंचकर जांच करें तो वास्तविकता स्वतः सामने आ जाएगी। लोगों का कहना है कि स्थिति इतनी स्पष्ट है कि किसी रिपोर्ट या शिकायत की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जांच के नाम पर जिम्मेदार अधिकारी इसलिए नहीं आते क्योंकि योजना में नीचे से ऊपर तक मिलीभगत की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। पंप ऑपरेटरों ने भी योजना की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि धरातल पर मुश्किल से 10 फीसदी कार्य ही प्रभावी रूप से हुआ है, जबकि केवल 20 से 30 फीसदी घरों तक ही किसी तरह पानी पहुंच पा रहा है। जहां पानी पहुंच भी रहा है, वहां गुणवत्ता की कोई सुनिश्चित व्यवस्था नहीं है। कई स्थानों पर पानी की शुद्धता को लेकर भी ग्रामीण असंतोष जता रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता भारत भूषण सिंह ने योजना पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि सरकार ने जिस नल-जल योजना को ड्रीम प्रोजेक्ट बताकर जनता के सामने प्रस्तुत किया था, वह आज आम लोगों के लिए अधूरा सपना बनकर रह गई है। शुद्ध पेयजल जैसी मूलभूत आवश्यकता को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश जगहों पर योजना का लाभ आंशिक या नगण्य है। यदि किसी योजना का 20 फीसदी हिस्सा ही काम करे और 80 फीसदी जनता तक न पहुंचे, तो उसे सफल नहीं बल्कि शून्य मानना चाहिए। करोड़ों रुपये खर्च कर केवल ढांचा खड़ा कर देना विकास नहीं कहलाता, वास्तविक विकास तब है जब अंतिम व्यक्ति तक स्वच्छ जल पहुंचे।पंप ऑपरेटरों का वर्षों से बकाया मानदेय:योजना की एक और गंभीर समस्या पंप ऑपरेटरों का लंबित भुगतान है।
प्रखंड के कई ऑपरेटरों ने बताया कि वर्षों से उनका मानदेय बकाया है। कुछ को आंशिक भुगतान मिला, जबकि कई ऐसे हैं जिन्हें अब तक एक भी भुगतान नहीं हुआ। ऑपरेटरों का कहना है कि संबंधित अधिकारी हर बार आश्वासन देकर मामले को टाल देते हैं। उनका आरोप है कि जो भुगतान तय है, वह भी न्यूनतम मजदूरी दर से काफी कम है, जिससे उनके समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।शिकायतों के बाद भी मरम्मत कार्य में लापरवाही:योजना की बदहाल व्यवस्था का उदाहरण जोरगामा वार्ड 12 में देखने को मिला, जहां भवन निर्माण के दौरान पाइप क्षतिग्रस्त हो गया। ग्रामीणों द्वारा शिकायत किए जाने के बावजूद दो दिन बाद तक मरम्मत नहीं कराई गई।
इससे जलापूर्ति पूरी तरह प्रभावित रही और लोगों को परेशानी झेलनी पड़ी। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही तो नल-जल योजना का उद्देश्य पूरी तरह विफल हो जाएगा। लोगों ने सरकार से मांग की है कि योजना की उच्चस्तरीय जांच कर दोषी ठेकेदारों और अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की जाए, ताकि जनता को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का सपना वास्तव में पूरा हो सके।