भागलपुर महिला कारा में मंजूषा कला कार्यशाला: रंगों से संवर रही महिला बंदियों की जिंदगी और उम्मीदें

By Gaurav Kabir

Published on: अभी-अभी

भागलपुर, 08 अगस्त 2026: जेल की चारदीवारी के पीछे भी उम्मीदों के नए रंग खिल सकते हैं, इसकी एक बेहतरीन मिसाल महिला मंडल कारा, भागलपुर में देखने को मिल रही है। यहां महिला बंदियों के लिए 'मंजूषा के रंगों से उम्मीदों की नई कहानी' विषय पर दो दिवसीय कला कार्यशाला का शानदार आयोजन किया गया है।

भागलपुर, 08 अगस्त 2026:

जेल की चारदीवारी के पीछे भी उम्मीदों के नए रंग खिल सकते हैं, इसकी एक बेहतरीन मिसाल महिला मंडल कारा, भागलपुर में देखने को मिल रही है। यहां महिला बंदियों के लिए ‘मंजूषा के रंगों से उम्मीदों की नई कहानी’ विषय पर दो दिवसीय कला कार्यशाला का शानदार आयोजन किया गया है।

​इस विशेष पहल का आयोजन भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) द्वारा किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य महिला बंदियों को अंग प्रदेश की प्रसिद्ध पारंपरिक ‘मंजूषा लोककला’ से जोड़ना और उनकी रचनात्मकता को एक नई एवं सकारात्मक दिशा देना है।

​कार्यशाला का भव्य उद्घाटन और प्रमुख अतिथि

​इस दो दिवसीय (8 और 9 अगस्त 2026) कार्यशाला का संयुक्त रूप से उद्घाटन इन प्रमुख गणमान्य व्यक्तियों द्वारा किया गया:

  • ICCR के प्रतिनिधि
  • श्री मनोज पंडित (प्रसिद्ध मंजूषा कला गुरु)
  • जेल अधीक्षक (शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा, भागलपुर)
  • श्री अंकित रंजन (कला एवं संस्कृति पदाधिकारी)
  • जेल अधीक्षक (महिला मंडल कारा, भागलपुर)

​क्या सीख रही हैं महिला बंदी?

​इस कार्यशाला में मंजूषा कला गुरु श्री मनोज पंडित के मार्गदर्शन में महिला बंदियों को मंजूषा चित्रकला की पारंपरिक शैली, इसके प्रमुख प्रतीकों, विशिष्ट आकृतियों और रंगों के सटीक प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

बंदियों को अंग प्रदेश की प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी की लोकगाथा और मंजूषा कला के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक जुड़ाव के बारे में भी गहराई से बताया जा रहा है। महिलाएं भारी उत्साह के साथ रंगों और रेखाओं के जरिए अपनी रचनात्मकता को कैनवास पर उतार रही हैं।

​अधिकारियों और विशेषज्ञों के विचार

“कारा सुधार का उद्देश्य केवल सुरक्षा नहीं”

महिला मंडल कारा की जेल अधीक्षक ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि जेल सुधार का मतलब सिर्फ सुरक्षा और अनुशासन तक सीमित नहीं है। बंदियों के भीतर छिपी प्रतिभाओं को मंच देना और उन्हें सकारात्मक गतिविधियों से जोड़ना भी इसका अहम हिस्सा है। कला से उनके भीतर आत्मविश्वास और नई उम्मीद का संचार होता है।

“सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण”

ICCR के प्रतिनिधि ने बताया कि भारतीय लोककलाएँ हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग हैं। ऐसे आयोजनों से न केवल पारंपरिक कलाओं का संरक्षण होता है, बल्कि समाज के हर वर्ग तक इसकी पहुँच सुनिश्चित होती है।

“नारी शक्ति की अभिव्यक्ति है मंजूषा”

कला गुरु श्री मनोज पंडित ने बंदियों का उत्साह बढ़ाते हुए कहा, “मंजूषा सिर्फ चित्रकारी नहीं है; यह अंग प्रदेश की लोकसंस्कृति, गहरी आस्था और नारी शक्ति को अभिव्यक्त करने वाली एक विशिष्ट परंपरा है।”

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